'शिशुपाल वध' में लाल रंग की गाय को रोहिणी कहा गया है। 'ज्योतिषशास्त्र' में चौथे नक्षत्र पुंज का नाम रोहिणी है। रोहिणी नक्षत्र की आकृति रथ की तरह है। 'वराहसंहिता' और 'पंचतंत्र' में इसका उल्लेख मिलता है। दक्ष की पुत्री और चन्द्रमा की संगिनी का नाम भी रोहिणी है। नौ वर्ष की कन्या भी रोहिणी कही गई है। बिजली के लिए भी रोहिणी शब्द का प्रयोग मिलता है। वासुदेव की पत्नी बलराम की माता का नाम भी रोहिणी था। चतुर्व्यूह सिद्धान्त में चार देवता आते हैं। उनमें वासुदेव कृष्ण के बाद संकर्षण का स्थान है। ये वासुदेव के बडे भाई थे। संकर्षण का अर्थ है- 'अच्छी तरह से खींचा गया'। संकर्षण अपनी मां देवकी के गर्भ से खींच लिए गए और रोहिणी के गर्भ में रखे गए। रोहिणी ने ही संकर्षण को जन्म दिया। 'कल्पसूत्र' में तीर्थüकर वर्द्धमान महावीर के गर्भापहरण की ऎसी ही घटना दर्ज है। इन्द्र की आज्ञा से हिरणगवेषी देवता ने वर्द्धमान महावीर को ब्राह्मणी देवानन्दा के गर्भ से क्षत्राणी त्रिशला के गर्भ में स्थापित किया। चन्द्रमा को रोहिणीश कहा गया है। लाल रंग को रोहित कहते हैं। हरिण और मछली की एक प्रजाति का नाम भी रोहित है। रक्त के लिए भी रोहित शब्द प्रयुक्त है। जाफरान यानी केसर को भी रोहित कहा गया है। अग्नि का एक नाम रोहिताश्व है। रूद्र जैसे प्रचण्ड को रौद्र कहते हैं। भीषण, बर्बर और भयंकर को भी रौद्र कहते हैं। शिव के उपासक को भी रौद्र कहा गया है। सरगर्मी और जोश के लिए भी रौद्र शब्द प्रयुक्त होता है। उग्रता, भीषणता और उष्णता के अर्थ में भी रौद्र शब्द देखा गया है। 'भगवतीसूत्र' में चार ध्यान की चर्चा है। इनमें दूसरे का नाम रौद्र ध्यान है, जिसका अर्थ है- अत्यन्त क्रोधाविष्ट होना।

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