अट्ठारह पुराणों में एक का नाम 'लिंगपुराण' है। इसमें शिव का माहात्म्य दिया है। लिंगपुराण में 11,000 श्लोक हैं। ब्रह्मा इसके वक्ता हैं। इसमें अट्ठाईस अवतारों का वर्णन मिलता है। परमशैव दधीचि की कथा भी इसमें कही गई है। योग और तंत्र इसका गूढवर्णन करते हैं। 'पद्मपुराण' में शंकर की मूर्ति को शिवलिंग कहा गया है। शिव के निष्क्रिय और जगत्कारण दो स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। पहला निष्क्रिय और निर्गुण है इसे अलिंग कहते हैं। दूसरा जगत्कारण रूप साकार या सगुण शिवलिंग कहा गया है। लिंग शिव भी अलिंग शिव से ही उत्पन्न है। जगत्कारण के रूप में शिवलिंग की पूजा पूरी दुनिया में हुई। प्राचीन मिस्र, अरब, यहूद, यूनान और रोम आदि देशों में इसका प्रचलन था। यहूदियों में 'बाल' देवता की प्रतिष्ठा लिंग रूप में थी। बेबिलोन के खण्डहरों से प्राप्त लिंग भी शिवलिंग के ही समरूप हैं। लिंग पूजा को लिंगार्चन भी कहते हैं।
जिस आधार पर शिवलिंग स्थापित होता है उसे लिंगवेदी कहते हैं। शिवलिंग की पूजा करने वाले लिंगांकित कहे गए हैं। लिंगायत शब्द का मूल आधार यही शब्द है। दक्षिण के लिंगायत सम्प्रदाय में शिवलिंग का बहुत महत्व है। अष्टवर्ग लिंगायतों का एक संस्कार है। बच्चे के जन्म के बाद पापों से उसकी रक्षा के लिए इसे किया जाता है। लिंग अष्टवर्गो में से एक है। हर लिंगायत गले में शिवलिंग धारण करता है। 'तंत्रशास्त्र' के अनुसार अमूर्त सत्ता का स्थूल प्रतीक लिंग है। इसके माध्यम से अव्यक्त सत्ता का ध्यान किया जाता है। महाभारत के पाशुपत परिच्छेदों में शिवलिंग के प्रति गहन श्रद्धा प्रदर्शित की गई है।
शिवपुराण तथा नंदी उपपुराण में शिव के बारह शाश्वत और प्रधान रूप वर्णित हैं- सोमनाथ- गुजरात में स्थापित हैं। मल्लिकार्जुन- कृष्णा नदी के निकट श्रीशैल पर है। महाकालेश्वर उज्जैन में है। ओंकारेश्वर- मध्यप्रदेश में नर्मदा के तट पर मान्धाता ग्राम में है। अमरेश्वर- उज्जैन में स्थित है। वैद्यनाथ के दर्शन देवधर में होते हैं। रामेश्वरम् में रामेश्वर विराजित हैं। यह ज्योतिलिंग लंका विजय के पूर्व श्रीराम द्वारा स्थापित किया गया। भीमशंकर अथवा भीमेश्वर- डाकिनी में है। काशी में विश्वेश्वर के दर्शन होते हैं। ˜यम्बकेश्वर- गोमती नदी के तट पर स्थापित है। गौतमेश्वर- वामेश्वर में और केदारेश्वर हिमालय पर स्थापित है।

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